आठ पहरों में से वो पहर

आठ पहरों में से वो पहर
जब आवाज़ लगाता हैं,
मेरा दिल उसे महसूस कर
कुछ पल रुक सा जाता हैं।

वो साँझ का ढलता सूरज,
मुझे सब याद दिलाता हैं।
ऐसा लगता हैं मानों,
सब अतीत में चला जाता हैं।
आठ पहरों में से वो पहर
जब आवाज़ लगाता हैं।

धीरे धीरे चलता वो नारंगी गोला,
ग़ायब ही हो जाता हैं।
और इन सब के बीच
ये आसमान न जाने कितने रंग बदल जाता हैं।
आठ पहरों में से वो पहर
जब आवाज़ लगाता हैं।

दिल एक कश्मकश में फँस जाता हैं,
“यूँ होता तो क्या होता… ” यही सोचता रह जाता हैं।
फ़िर आज से समझौता कर,
ग्लानि भाव से शांत जाता हैं।
आठ पहरों में से वो पहर
जब आवाज़ लगाता हैं।

क्या खोया क्या पाया,
सबका हिसाब लगाता हैं।
मुनीम की तरह फ़ायदा या नुकसान,
हर रिश्तें से जोड़ जाता हैं।
आठ पहरों में से वो पहर
जब आवाज़ लगाता हैं।

ये पहर बीतता जाता हैं
और फ़िर अँधेरा छा जाता।
मन घबरा कर बैचैन हो जाता हैं,
क्योंकि उसे भविष्य ऐसा ही नजर आता हैं।
आठ पहरों में से वो पहर
जब आवाज़ लगाता हैं।

अँधेरा जब घना जाता हैं ,
तब मन आशा का एक दीप जलाता हैं।
रौशनी धीमी हैं उसकी लेकिन,
सूरज के आने तक यहीं ढाढ़स बढ़ाता हैं।
आठ पहरों में से वो पहर
अब खत्म जाता हैं।

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